Thursday, June 6, 2013

गौर अे गणगौर माता

संपूर्ण राजस्थान और राजस्थान से सटे मध्यप्रदेश •े भू-भाग (मालवा) तथा जहाँ-जहाँ भी राजस्थानी हैं, वहाँ इस महान सांस्•ृति• पर्व •ो बड़े उत्साह उल्लास सहित मनाया जाता है। मूलत: यह स्त्रियों द्वारा •िया जाने वाले गौरी-व्रत है जो •ुमारियाँ सुयोग्य वर •ी प्राप्ति और विवाहिताएँ सौभाग्य •ी अखण्डता •े लिए अवश्य •रती हैं। यह त्यौंहार होलि•ा •ी राख से बनी पिण्डियों •ी पूजा •े रूप में संभवत अष्टमातृ•ा पूजन •े रूप में •िसी प्राचीन लो•ोत्सव •े रूप में था जो बाद में पौराणि• गौरी अथवा गवरजा •े ईसर (शिव) से विवाहोत्सव •े रूप में मनाया जाने लगा जिसमें •ई दिन त• विवाह •ा उत्सव होता है। अंत में गवरजा •ी ससुराल •े लिए विदाई •े रूप में, चैत्र •ृष्ण प्रतिपदा से प्रारम्भ इस व्रत •ी सम्पन्नता पर चैत्र शुक्ल तृतीया •ो (और उस•े बाद भी) नि•ाली जाने वाली गौरी देवी •ो उत्सवपूर्ण दोलयात्रा (शोभायात्रा) अथवा सवारी •े आयोजन में पुरूषों •ी भी उत्साहपूर्ण भागीदारी होती है। राजस्थान •ी पूर्व रियासतों •े राजपरिवारों •ी स•्रिय भागीदारी से यह व्रतानुष्ठान राज•ीय त्यौंहार •े रूप में प्रतिष्ठित हुआ। विभिन्न रियासतों •े राजभवनों में राजपरिवार •ी महिलाओं द्वारा पूजित श्रृंगारित गौरी प्रतिमा •ी सवारी, मय राज•ीय लवाजमे •े नि•लती थी जिसमें स्वयं राजा, सामंतगण व नगर •े गणमान्य लोग सम्मिलित होते थे। इसी •ा अनु•रण रियासतों •े विभिन्न ठि•ानों, नगरों, गावों में भी होता था। सवारी में तोपों - बन्दु•ों •ी सलामी, राज•ीय निशान, गाजा-बाजा, नाच-गान, •रतब-प्रदर्शन, घोड़ो-ऊँटों •ी दौड़ इत्यादि •ा आयोजन होता थो, •हावत है - ''घोड़ा गणगौर्यां नै नहीं दौड़ै तो •द दौड़ैगा।ÓÓ

•तिपय पूर्व राजपरिवार अभी भी इस परम्परा •ा निर्वाह •र रहे हैं, तो अन्यत्र इस शोभा-यात्रा •ा आयोजन सार्वजनि• सहयोग से •िया जा रहा है। राजस्थान •े सभी प्रमुख नगरों, •स्बों, गाँवों में पूर्व राज•ीय अथवा सार्वजनि• गौरी (गणगौर) प्रतिमाएँ हैं जिन•ी शोभायात्रा धूम-धाम से नि•ाली जाती है। गणगौर •ा त्यौंहार राजस्थान •ी पहचान •े रूप में वहाँ •ा प्रतिनिधि पर्व है। जहाँ •हीं भी राजस्थानी परिवार रहते हैं वहाँ गणगौर-व्रत •ा अनुष्ठान अवश्य होता है। •ोल•ाता, मुम्बई इत्यादि स्थानों पर जहाँ राजस्थानी परिवार पर्याप्त संख्या में हैं वहाँ गणगौर •ी सवारी नि•ालने •े सार्वजनि• आयोजन भी होते हैं।
गवरजा, माँ है जो पूजनेवाली युवतियों •ो मनवांछित वर, विवाहिताओं •ो अखण्ड सौभाग्य, संतति और लाखर लिछमी प्रदान •रती है, तो वह बड़ी बहन है, सखी है जिससे पूजनेवालियाँ अपनी सब अन्तरंग बातें त• •र लेती हैं, उससे रमझोळ मचाती है, उस•े साथ खेलती हैं, नाचती हैं-गाती हैं। जीजा ईसर से मजा•ें होती हैं। जब वह विदा होती है ससुराल •े लिए, ये सब छोटी सखियां उदास हो जाती है। गवरजा बेटी भी है इसी से ममत्वभरी प्रौढ़ वृद्ध महिलाओं •ी आँखें छलछला आती हैं, विदाई •े समय।

गणगौर / गवरजा •ा परिवार

राजस्थान में गौरी •ो मुख्यत: गणगौर अथवा गवरजा •हा जाता है, जब•ि गौणत: विशेषरूप से लो•गीतों में गौर, गौरां, गौरल, गवरां, गवरल, गवरी, गवर इत्यादि प्रियतापर• सम्बोधन भी प्रयुक्त हैं। भगवान शिव •े विभिन्न नामों में 'गौरÓ भी ए• नाम है जो लो•गीतों में ईसर और •ानीराम •े विशेषण स्वरूप भी प्रयुक्त हुआ है। लो•गीतों में गवरजा •ा भरा-पूरा परिवार है - गवरजा •े पति •ा नाम ईसर (ईश्वर, शिव) या ईसरदास है, देवर •ा नाम •ानीराम है, नणदों •े नाम रोवां-सोवां हैं, श्वसुर •ा नाम बिरमादासजी / बिरमादतजी (ब्रह्माजी) है, सासू •ा नाम सांवतदे (सावित्री देवी) है। गवरजा •े पिता •ा नाम हेमाजल (हिमाचल), माता •ा नाम मैणादे (मैना देवी) और भाई •ा नाम भड़मल (भरमल, भट्टमल्ल)है। •िसी-•िसी गीत में गवरजा •ी नणद रोवां •े पति •ा नाम सूरजमल इंगित होता है, सूरज •ी पत्नी •ा नाम रैणादे भी लिया जाता है। चन्द्रमा और उस•ी पत्नी रोयणदे (रोहिणी) •े नाम भी गीतों में हैं।

गणगौर •ौन ?

'गणगौरÓ में दो शब्द हैं - 'गणÓ और 'गौरÓ (गौरी)। गौरी, पार्वती •ा ही ए• नाम है। •ुछ विद्वानों •े मत में 'गणÓ •ा अर्थ 'शिवÓ (ईश्वर) है और इस तरह गण-गौर से तात्पर्य शिव-पार्वती से है। परन्तु यहाँ मूल आपत्ति तो यही है •ि 'गणÓ •ा अर्थ •िसी भी ग्रन्थ में 'शिवÓ नहीं बताया गया है। वे अपने गणों (चरों) •े स्वामी हैं, गण नहीं। फिर हम लो•गीतों व आम बोलचाल पर ध्यान दें तो उनमें 'गणगौरÓ •े साथ 'ईसरÓ (ईश्वर) नाम शिव •े अर्थ में अलग से प्रयुक्त हुआ है, यदि 'गणÓ •ा तात्पर्य 'शिवÓ (ईसर) है तो अलग से ईसर •हने •ी आवश्य•ता ही नहीं है। इस प्रसंग में दो मत स्वी•ार योग्य है - ए• तो राजस्थान •े सुप्रसिद्ध इतिहास•ार डॉ० दशरथ शर्मा •ी यह मान्यता •ि गणगौर में 'गणÓ •ी सत्ता •िसी प्राचीन गणराज्य या गणराज्यों से इस उत्सव •े सम्बन्ध •ी परिचाय• है (मरूभारती, पिलानी, वर्ष ८ अं• ४ ७१)। यहाँ यह उल्लेखनीय है •ि प्राचीन •ाल में राजस्थान •े भू-भाग में यौधेय, अर्जुनायन इत्यादि विभिन्न गणराज्य अर्थात गणतंत्र अस्तित्व में थे जिन•े चयनित शास• 'गणपतिÓ या 'गणनाय•Ó •हे जाते थे। इसी तरह पूरे गणराज्य व शासन द्वारा पूज्य देवता •ो गणदेवता •हा जाता था। संभवत: इन गणराज्यों में देवी गौरी, गणदेवी •े रूप में पूज्य थी जिसे 'गणगौरीÓ •हा जाता था। इस मत से राजस्थान में गणगौर त्यौंहार •े प्रचलन •ा इतिहास हजारों वर्ष पूर्व चला जाता है। दूसरा यह •ि 'गणÓ •ा तात्पर्य समूह होता है और इस आधार पर राजस्थान •े सुप्रसिद्ध संस्•ृत विद्वान डॉ० देवर्षि •ालानाथ शास्त्री •ा मत है •ि गणगौर, गौर्यादि षोडश मातृ•ाओं •े समूह (गण) •ा व्रतानुष्ठान है जो षोडश (सोलह) दिन त• •िया जाता है। शास्त्रीजी •े मत •ा तात्पर्य है •ि यह विभिन्न नामों वाली सोलह मातृ•ाओं •े समूह (गण) •ी पूजा है। इन मातृ•ाओं में मातृ•ा गौरी प्रथम और प्रधान है अत: इसे 'गौरीगणÓ और विपर्यय से 'गणगौरीÓ •हा जाता है।
गणगौर •ा त्यौंहार, वस्तुत: शाक्तमत •ी देवियों •ी तरह, स्वतंत्र रूप से गौरी उपासना लगती है जिसमें बाद में शिव या ईश्वर •ो भी संयुक्त •र दिया गया और गणेश •ो भी। यह भी ध्यातव्य है •ि राजस्थान में नि•लने वाली शोभायात्राओं में बहुत सी जगहों पर अ•ेली गवरजा •ी प्रतिमा ही होती है, तो •ई जगहों पर ईसर •ी प्रतिमा भी होती परंतु यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित है •ि इस गणगौर व्रतोत्सव में और पौराणि•-साहित्यि• संदर्भो में, देवी गौरी या गवरजा ही प्रधान हैं, ईसर (ईश्वर) या शिव ए•दम गौण है।
गणगौर •ा उद्भव-अर्थ •ुछ भी रहा हो, आज तो यह लो•-देवी अखण्ड सुहाग •ी प्रती• है। यह लो•देवी, पाहुनि, बहिन, गोठन, सखी, सहेली सब •ुछ है, मनवांछित घर-वर •ा वरदान देने वाली ममतामयी माता है। छोटी-छोटी लड़•ियाँ गणगौर •ी पूजा देवी •े रूप में •रती है, •िन्तु सुहागिन स्त्रियों •े लिए जहाँ गणगौर सुहागदायिनी है, वहाँ उन•ी •िशोरी •न्या •े समान भी है, जिसे वे सजन नयनों से पूजन •े अन्तिम दिन भावभीनी विदाई देती है। लो•मानस •ा जीवन-दर्शन •ितना गूढ़ गहन और गरिमामय है, इसे उस•ी गहराई में पैठे बिना नहीं समझा जा स•ता।
वर प्राप्ति •े लिए जो भी •ुमारी •न्या गवरल-पूजन •रना प्रारम्भ •रती है, वह गणगौर •ो •भी विस्मृत नहीं •र पाती। विवाह •े समय जब दूल्हा द्वार पर आता है तो बनड़ी सर्वप्रथम गणगौर •ा स्मरण •र•े, उस•ी पूजा •रती हैं, तत्पश्चात वर-वरण •े लिए जाती है - ''राईवर डोल रह्या तोरण पर, बनड़ी पूज रही गणगौर।ÓÓ
विवाह •े बाद जब •न्या ससुराल जाती है तो उसे मिट्टी •े बने घर (घरवा) में गणगौर रख •र दी जाती है जिसे वह बहुत संभाल •र ले जाती है। तदुपरांत जब पहली बार गणगौर •ा पर्व आता है तब वह •न्या गणगौर पूजन •े लिए अपने पीहर आती है।
गणगौर •े गीतों •े भावों और उन•ी लो•धुनों •ा माधुर्य प्राणों में अमृत घोल देता है, मन •ो रससिक्त •र देता है। गणगौर •े असंख्य परम्परागत गीत हैं। उनमें अने• आज भी असं•लित हैं। सदि गणगौर •ो मोह• गीतों •ा पर्व •हा जाए तो अत्युक्ति नहीं होगी। गणगौर पर्व •े दिनों में सारे राजस्थान •ा वातावरण गीत-संगीतमय हो उठता है। धरती, वृक्ष, मरूभूमि सभी गाने लगते हैं। पक्षियों •े •ूजन में भी जैसे गणगौर •े मधुर गीतों •ी स्वर-लहरी सुनाई पड़ती है। गणगौर •े गीत राजस्थानी ही नहीं बल्•ि भारतीय लो• साहित्य •ी भी अमूल्य सम्पदा •े तुल्य हैं।
राजस्थान में गणगौर-पर्व में जोधपुर, •ोटा, उदयपुर, जयपुर, शेखावाटी, बी•ानेर में जो विराट उत्सव होते हैं, उन•ा अपना वैशिष्टय है। राजस्थान में •ेवल बूंदी ही ए• ऐसा स्थान है जहाँ गणगौर पर्व नहीं मनाया जाता। •हा जाता है •ि गणगौर पर्व में वहां •े राव बुधसिंह •े भाई जोधसिंह ए• दुर्घटना में फलस्वरूप डूब गये थे तब से इस त्यौंहार •ा मनाना वहां बंद हो गया।

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