भगतसिंह भारत के उन महान स्वतंत्रता संग्रामियों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं जो भारत माता की विदेशी गुलामी से मुक्ति के लिए किसी भी कुर्बानी को बड़ा नहीं समझते थे। अपने सिद्धांतों के प्रति अमिट विश्वास रखते हुए वे किसी भी मुसीबत में कभी नहीं डगमगाएँ अगाध देशभक्ति, अपनी जनता के प्रति असीम स्नेह व अपार दिलेरी से उन्होंने अपने उद्धेश्य के लिए भरी जवानी में ही अपनी जान कुर्बान कर दी।
शहीद के दादा जी स. अर्जुन सिंह 1900 में अपने पुश्तैनी गाँव खटकड़ कलां (जालंधर)( अब जिला शहीद भगत सिंह नगर) से लायलपुर जिले (अब पाकिस्तान में फैजलाबाद जिला) में जो आबाद हुए थे। यह सिख जाट परिवार पश्चिमी पंजाब की नहरी पानी वाली जरखेज़ ज़मीनों को आबाद करने के लिए पूर्वी पंजाब से जाने वाले असंख्य किसान परिवारों में से एक था। स. अर्जुन सिंह समाज सुधारों के पक्के पैरोकार थे व उन्होंने लोगों को मृतप्राय: रस्मों व रीतों से मुक्त करवाने का दिल्ली प्रयास किया। उनके पूर्वजों ने 1857 में यह निर्णय लिया था कि वे कभी भी अपने सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं करेंगे और उन्होंने स्वतंत्रा की पहली जंग के भारतीय वतनप्रस्तों की खिलाफत के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी की ओर से खुली जमीन देने की पेशकश को पूरी तरह ठुकरा दिया था। स. अर्जुन सिंह ने भी यही प्रण निभाया था वे भी अधिकारों की लड़ाई में जनता का साथ निभाने के मार्ग पर ही चलें पंजाब के उच्च जगीरू परिवारों के सिद्धांत से टूटकर वे सिंह सभा के भी विरोध में खड़े रहे जो 1872 में बर्तानवी अधिकारियों ने खड़ी की थी। पंजाब के दौरे पर आए स्वामी दयानंद को सुनने के बाद वे आर्य समाजियों से जुड़ गए थे, क्योंकि आर्य समाज खुदगर्जी को छोड़ सामाजिक उद्देश्यों में शामिल होने व छुआ-छूत के निवारण का प्रचार करते हुए इन्हीं सिद्धांतों पर अमल करता था व समाज की मजबूती के लिए समाज सुधारों की पैरवी करता था इसलिए यही देशभक्ति की चूल थी। सरदार अर्जुन सिंह के तीन सुपुत्र सरदार किशन सिंह, सरदार अजीत सिंह व सरदार स्वर्ण सिंह थे। इनका जन्म स्थान खटकड़ कलां था। वर्ष 1905 बड़ी राजनैतिक उथल-पुथल वाला वर्ष था जब 28सितम्बर शनिवार को सुबह पौने नौ बजे इस महान शहीद का जन्म हुआ था। 1905 के बंगाल विभाजन व 1907 के कॉलोनी एक्ट से विदेशी हकूमत ने आम आदमी के नाक में दम कर रखा था। पंजाबी किसान ने तंग आकर किसान के स्व:मान को लगी ठेस के खिलाफ पगड़ संभाल ओ जट्टा की सुर बुलंद की हुई थीँ जैसे होना ही था यह परिवार सबसे आगे था इसलिए नतीजन स. किशन सिंह को नजरबंदी, स. अजीत सिंह को जलावतनी व स. स्वर्ण सिंह को कैद की सौगात मिली। बच्चो के जन्म के साथ इन तीनों सदस्यों के नजरबंदी, जलावतनी व कैद से वापिस आने की खबर मिलने के कारण परिवार के बच्चों को किस्मत वाला माना और बाद में इसका नाम भगत सिंह रखा गया जो जालिमों के लिए दहशत व मजलूमों के आशा का प्रतीक था। स. भगत सिंह के जीवन विकास पर जिस घटनाओं ने गहन प्रभाव डाला, उनमें से एक साका जलियांवाला बाग था जो 13 अप्रैल 1919 को घटित हुआ, जिसमें जनरल डायर व उसके सिपाहियों ने असंख्य निहत्थे मर्दों, औरतों व नन्हें बच्चों का कत्लेआम किया था। इस दु:खांत ने भगत सिंह को अंदर तक झंझोड़ कर रख दिया। वे उस वक्त 12 साल की आयु के थे। अगले दिन स्कूल जाने की बजाए भगत सिंह ले जलियांवाला बाग जाने के लिए रेलवे स्टेशन से अमृतसर की गाड़ी पकड़ ली। वहां पहुंचकर उन्होंने अपनी जेब से एक कांच की शीशी निकाली और निहत्थे व मासून भारतीयों पर बर्तानवियों ने जुल्म की निशानी के तौर पर मासूम लोगों के रक्त से सनी मिट्टी उस में भर ली।
शहीद के दादा जी स. अर्जुन सिंह 1900 में अपने पुश्तैनी गाँव खटकड़ कलां (जालंधर)( अब जिला शहीद भगत सिंह नगर) से लायलपुर जिले (अब पाकिस्तान में फैजलाबाद जिला) में जो आबाद हुए थे। यह सिख जाट परिवार पश्चिमी पंजाब की नहरी पानी वाली जरखेज़ ज़मीनों को आबाद करने के लिए पूर्वी पंजाब से जाने वाले असंख्य किसान परिवारों में से एक था। स. अर्जुन सिंह समाज सुधारों के पक्के पैरोकार थे व उन्होंने लोगों को मृतप्राय: रस्मों व रीतों से मुक्त करवाने का दिल्ली प्रयास किया। उनके पूर्वजों ने 1857 में यह निर्णय लिया था कि वे कभी भी अपने सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं करेंगे और उन्होंने स्वतंत्रा की पहली जंग के भारतीय वतनप्रस्तों की खिलाफत के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी की ओर से खुली जमीन देने की पेशकश को पूरी तरह ठुकरा दिया था। स. अर्जुन सिंह ने भी यही प्रण निभाया था वे भी अधिकारों की लड़ाई में जनता का साथ निभाने के मार्ग पर ही चलें पंजाब के उच्च जगीरू परिवारों के सिद्धांत से टूटकर वे सिंह सभा के भी विरोध में खड़े रहे जो 1872 में बर्तानवी अधिकारियों ने खड़ी की थी। पंजाब के दौरे पर आए स्वामी दयानंद को सुनने के बाद वे आर्य समाजियों से जुड़ गए थे, क्योंकि आर्य समाज खुदगर्जी को छोड़ सामाजिक उद्देश्यों में शामिल होने व छुआ-छूत के निवारण का प्रचार करते हुए इन्हीं सिद्धांतों पर अमल करता था व समाज की मजबूती के लिए समाज सुधारों की पैरवी करता था इसलिए यही देशभक्ति की चूल थी। सरदार अर्जुन सिंह के तीन सुपुत्र सरदार किशन सिंह, सरदार अजीत सिंह व सरदार स्वर्ण सिंह थे। इनका जन्म स्थान खटकड़ कलां था। वर्ष 1905 बड़ी राजनैतिक उथल-पुथल वाला वर्ष था जब 28सितम्बर शनिवार को सुबह पौने नौ बजे इस महान शहीद का जन्म हुआ था। 1905 के बंगाल विभाजन व 1907 के कॉलोनी एक्ट से विदेशी हकूमत ने आम आदमी के नाक में दम कर रखा था। पंजाबी किसान ने तंग आकर किसान के स्व:मान को लगी ठेस के खिलाफ पगड़ संभाल ओ जट्टा की सुर बुलंद की हुई थीँ जैसे होना ही था यह परिवार सबसे आगे था इसलिए नतीजन स. किशन सिंह को नजरबंदी, स. अजीत सिंह को जलावतनी व स. स्वर्ण सिंह को कैद की सौगात मिली। बच्चो के जन्म के साथ इन तीनों सदस्यों के नजरबंदी, जलावतनी व कैद से वापिस आने की खबर मिलने के कारण परिवार के बच्चों को किस्मत वाला माना और बाद में इसका नाम भगत सिंह रखा गया जो जालिमों के लिए दहशत व मजलूमों के आशा का प्रतीक था। स. भगत सिंह के जीवन विकास पर जिस घटनाओं ने गहन प्रभाव डाला, उनमें से एक साका जलियांवाला बाग था जो 13 अप्रैल 1919 को घटित हुआ, जिसमें जनरल डायर व उसके सिपाहियों ने असंख्य निहत्थे मर्दों, औरतों व नन्हें बच्चों का कत्लेआम किया था। इस दु:खांत ने भगत सिंह को अंदर तक झंझोड़ कर रख दिया। वे उस वक्त 12 साल की आयु के थे। अगले दिन स्कूल जाने की बजाए भगत सिंह ले जलियांवाला बाग जाने के लिए रेलवे स्टेशन से अमृतसर की गाड़ी पकड़ ली। वहां पहुंचकर उन्होंने अपनी जेब से एक कांच की शीशी निकाली और निहत्थे व मासून भारतीयों पर बर्तानवियों ने जुल्म की निशानी के तौर पर मासूम लोगों के रक्त से सनी मिट्टी उस में भर ली।
बर्तानवी टोडियों की ओर से गुरुद्वारों के दुरुपयोग संबंधी अवामी जागरूकता के लिए गुरुद्वारा लहर शुरू हुई थी। इसकी ओर से जलियांवाला बाग के मासूमों के कातिल जनरल डायर को सिरोपा देने से देशभक्तों में रोष व्याप्त हो गया। दरबार साहिब व इसकी परिक्रमा में प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए अंग्रेजों ने महंत, पुजारी व भाई नियुक्त किए हुए थे स्वर्ण मन्दिर का सरबराह जागीरू रवैये से मजहबी सिखों को माथा टेकने लिए नहीं खुसने देता था। देशभक्तों कने इसे दरबराह को मजा चखाने का मुद्दा बना लिया 500 मजहबी सिखों का एक जत्था दरबार साहिब गया। यह एक बड़ा मुदïदा बन गया और दरबार साहिब के नियंत्रण का हक लोकतांत्रिक लोगों के सुपूर्द करना पड़ा। इसके बाद बाकी गुरुद्वारों पर भी समुदाय का कब्जा हो गया।
जलियांवाला बाग के साके जैसा ही एक दु:खांत फरवरी 1921 में साका गुरुद्वारा ननकाना साहिब गुरु नानक देव जी का जन्मस्थान घटित हुआ। गुरुद्वारे के महंत ने अंग्रेज अधिकारियों की प्ररेणा से गुरुद्वारे के अंदर ही 139 सिखों का वध कर दिया। सारे पंजाब में मातम छा गया और इसके रोष में पजाब के लोगों ने गांवों व शहरों में काली पगडिय़ां व पटके बांध लिए। इस घटना ने शहीद भगत सिंह पर इतना गहरा असर किया कि वे गुरुमुखी सीखने लग पड़े और लाहौर से छपते अकाली जैसे और पंजाबी समाचार पत्रों में निबंध भेजने लगे।
इसी दौरान गुरुद्वारा सुधार लहर के पक्के हिमायती राजा रिपुदमन सिंह से नाभा रियासत की गद्दी छीन ली गई। इससे समस्त सिख भड़क उठे और जैतो के मोर्चे का आरम्भ हुआ। मुदïदा बना जैतो के गुरुद्वारे में सभी को माथा टेकने की आजादी हो गुरुद्वारे में माथा टेकने के हक की बहाली के लिए जैतो का शहीदी जत्थे रवाना किए जा रहे थे। बर्तानवी हकूमत पूर्ण वहशी दमन पर उतर आई व उसने हुक्म दिया कि जैतो को जा रहे जत्थों की कोई सेवा सुशुर्पा न करे। एक जत्था जिला लायलपुर से जाना था व सरकार ने आदेश जारी कर दिया था कि इस जत्थे को यदि किसी ने पानी भी पिलाया तो उसे सज़ा दी जाएगी।
भगत सिंह ने यह चुनौती स्वीकार की और किसानों की सहायता से लंगर का प्रबंध किया और सरकार के अदेशों की धज्जियां उड़ाने हुए जत्थे को लंगर खिलाया। गुरुद्वारों के नियंत्रण का लोकतांत्रिक हक अहिंसक ढंगों से हासिल करना। भारतीय राष्टीय आंदोलन के लिए एक बड़ी मिसाल बना। अपने गांव में अपनी आरम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे डी.ए.वी. हाई स्कूल में पढ़े। यह 1921 का दौर था जब असहयोग आंदोलन प्रायोजित किया हुआ था। वह आहवान के फलस्वरुप भगत सिंह ने डीएवी स्कूल छोड़ दिया और आंदोलन में कूद पड़े। अभी उन्होंने दसवीं पास नहीं की थी। पर असहयोग आंदोलन वापिस लेने के बाद युवाओं को परामर्श दिया गया था कि वे अपने स्कूलों कॉलेजों में चले जाएं, पर बहुत सारों ने ऐसा करना न माना, भगत सिंह भी उनमें से एक थे। फिर इन युवाओं की शिक्षा की आवश्यकता पूरी करने के लिए ब्राडला हाल में नेशनल कालेज स्थापित किया गया। नेशनल कॉलेज लाहौर के कर्ता-धर्ता लाला लाजपत राय व भाई परमानन्द थे। भगत सिंह ने विशेष टेस्ट पास करके अपने दोस्त जै गुप्त के साथ इस कालेज में दाखिला लिया। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए सख्त मेहनत करने का सबक भगत सिंह ने ले लिया था।
नेशनल कॉलेज में राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर जानकारी हासिल करने व इस पर जमकर बहस करने का माहौल बनाया गया। यहीं परभगत सिंह अपने भविष्य के साथियों जैसे भगवती चरण वोहरा, सुखदेव, यश पाल, जैसे देव इत्यादि के सम्पर्क मे आए। यहां पर उन्होंने इतिहास, राजनीति व अर्थशास्त्र इत्यादि विषयों पर गहन अध्ययन किया। उनकी विशेष रूचि संसार के विभिन्न देशों के क्रांतिकारी इतिहास में अधिक रही। कॉलेज में वे विद्यार्थी वर्ग के नेता के तौर पर उभरे व कालेज की विद्यार्थी यूनियन की स्थापना की। कालेज के दिनों में भगत सिंह ने असहयोग आंदोलन में क्रियात्मक भाग लिया क्योंकि गांधी ने भरोसा दिया था।
1922 में जिला गोरखपुर के नगर चौरा-चौरा में एक मुजाहिरा किया जिसमें पुलिस ने कुछ असहयोग आंदोलन के कार्यकत्ताओं को कत्ल कर दिया। कुछ आंदोलकारियों को इसका दु:ख हुआ और पुलिस कर्मचारियों के एक मकान को आग लगा दी। मुख्य कांग्रेस नेता गांधी व नेहरू इस आंदोलन के प्रायोजक थे जिन्होंने आंदोलन खत्म कर दिया।
आंदोलन को खत्म करने के फैसले से भगत सिंह व युवाओं को गहरी चोट लगी व उनमें निराशा व्याप्त हो गई। क्या सिर्फ इसीलिए इतने महत्वपूर्ण आंदोलन को त्याग दिया जाना था कि आजादी प्राप्ति के संघर्ष में कुछ पुलिस कर्मचारी की जानें चलीं गई थी, जबकि इस आंदोलन के चंद दिन पहले ही बर्तानवी हकूमत सिर्फ 19 वर्ष के क्रांतिकारी स. करतार सिंह सराभा को फांसी दे थी जो भगत सिंह के आदर्श नायक थे। उस वक्त तो अहिंसा के पैरोकारों ने इसके विरोध में एक शब्द भी नहीं बोला था। अहिंसा अब इतना महत्व कैसे प्राप्त कर गई थी, ऐसी सोच ने भगत सिंह को अहिंसा व असहयोग आंदोलन पर प्रश्र उठाने के रास्ते पर चलाया।
आदोलंन स्थगित की खबर से पूरे देश में एक अजीब मातम छा गया। नेहरू व गांधी का यह तर्क किसी की समझ में नहीं आया। अंग्रेजो द्वारा भारतीय पर अत्याचार अहिंसा है। यह बात हर छात्र के समझ से परे थी और अपने आप को ठगा महसूस करने लगें। आयोजक अंग्रेज हकूमत लगने लगी। भगतसिंह और उनके साथियों सहित सभी राष्ट्र भक्तों ने इस आंदोलन पर प्रश्र चिन्ह लगा दिया। सुभाषचन्द्र बोस ने कहा - कोई भी न समझ सका कि गांधी ने चौरा-चौरी की विछन्न (छोटी सी) घटना का इस्तेमाल कर सारे देश के आंदोलन का गला क्यों घोटा।
परिवार में शादी के दबाव को टालने के लिए भगत सिंह 16साल की आयु में ही घर से कानपुर को निकल गए। कानपुर में ही वे यूपी व बिहार के क्रांतिकारियों को मिले थे व एच.आर.ए. (हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन) में शामिल हुए थे। कानपुर में उन्हें पत्रकारिता सीखने, विश्व राजनीति के बारे में जानने व राष्ट्रीय मुद्दों पर सोचने का अवसर श्री गणेश शंकर विद्यार्थी की अगुवाई में मिला जो विलक्षण दिलेरी व राष्ट्रीय दूर-दृष्टि वाली एक महान राष्ट्रीय शख्सीयत थे। यहीं पर उन्होंने आयरलेण्ड के महान संग्रामी योद्धा डान ब्रीन की जीवनी का अनुवाद किया। इस महान नायक के अविस्मर्णीय दिलेरी से अपने और देशभक्त साथियों के साथ मिलकर 1922 में ही आयरलेण्ड के लिए डोमिनियन स्टेटस हासिल कर लिया था जबकि भारतीय आंदोलन इस मुद्दे पर असफल रह गया था। युवाओं में क्रांतिकारी रूझान पैदा करने व एच.आर.ए. को मजबूत बनाने के लिए भगतसिंह ने 1925 में नवयुवक भारत सभा की स्थापना जो कि मुख्य रूप में मजदूरों व किसानों की जत्थेबंदी थी, व इसके महासचिव रहे। युवाओं पर भगत सिंह के प्रभाव से डरकर लाहौर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया व उनका फजऱ्ी नाम 1926के दशहरा बम केस में डाल दिया व 4 मास तक जेल में रखा व अंत में साठ हजार रुपय की जमानत पर उन्हें छोड़ा 1928 का वर्ष राष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में विशेष महत्व रखता है जब भगत सिंह व उनके साथियों के प्रयासों से नव युवक भारत सभा ने समाजवादी व अंतर्राष्ट्रीय नज़रिए को अपनाया। इसका नाम भी बदलकर हिन्दुस्तान सोसिएशन रख दिया गया ....

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